केरल की सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी अभियान का अंत निराशाजनक रहा।
अपने आखिरी मैच में टीम सिर्फ 101 रन ही बना पाई और टूर्नामेंट से बाहर हो गई। संजू सैमसन की गैरमौजूदगी ने टीम को पूरी तरह बिखरा दिया।
मिडिल ऑर्डर न तो टिक पाया और न ही कोई निर्णायक पारी खेल पाया। ना जोश दिखा, ना स्थिरता।
शुरुआत से ही विपक्षी गेंदबाजों ने दबदबा बनाया। केरल लगातार विकेट गंवाता रहा। कोई भी बल्लेबाज़ इतनी देर क्रीज़ पर नहीं टिक पाया कि पारी संभाल सके।
थोड़ी-बहुत साझेदारियां ज़रूर बनीं, लेकिन कुछ भी खास नहीं हो पाया।
टीम कभी भी मैच पर नियंत्रण नहीं कर पाई।
गेंदबाज़ी के दौरान केरल ने कोशिश की और इरादे के साथ गेंदबाज़ी की। लेकिन 101 रन जैसे छोटे लक्ष्य की रक्षा करना लगभग नामुमकिन था। विपक्ष ने बिना किसी दबाव के आसानी से लक्ष्य हासिल कर लिया।</p>
संजू सैमसन की कमी साफ़ नजर आई।
वह टीम के मुख्य बल्लेबाज़ ही नहीं हैं, बल्कि मानसिक मजबूती और नेतृत्व का भी बड़ा सहारा हैं।
उनकी अनुपस्थिति में मध्यक्रम अनुभवहीन और कमजोर दिखा। दबाव में कोई खिलाड़ी आगे नहीं आया।
अब इस हार के बाद चर्चा शुरू हो गई है—टीम संयोजन बदलने की, बेंच स्ट्रेंथ मजबूत करने की और अगले सीज़न के लिए रणनीति बदलने की।</p>
यह हार सिर्फ टूर्नामेंट का अंत नहीं है, बल्कि कई मुश्किल सवाल भी खड़े करती है:
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टीम कितनी हद तक कुछ स्टार खिलाड़ियों पर निर्भर है?
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बेंच कितना मजबूत है?
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क्या टीम दबाव की स्थिति में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है?
कभी-कभी केरल ने अच्छा खेल दिखाया, लेकिन इस पूरे अभियान में सबसे बड़ी कमी रही लगातार अच्छा प्रदर्शन (consistency) की।

















































